Sunday, April 3, 2011

वलवले

मुझे तनहाइयाँ, बहला रहीं हैं |
मुझे यह छेड़ कर, इठला रहीं हैं || 
शरारत ही, इसे तो, मैं कहूँगा |
ख्यालों को मेरे उलझा रहीं हैं ||

वलवले

कुनबा है इक, ज़हान यह, परवरदिगार का |
मतलब, बदल दिया है, ज़माने ने प्यार का ||
छोटा करे लिहाज़, बड़ा प्यार दे उसे |
ऐसे में ज़िक्र, हो कहाँ ,फिर जीत-हार का || 
घर एक है, ज़मीन यह, छत जिसकी आसमान |
शैतान की ईजाद है, उठना दीवार का ||
गर आज भी, ईमान की, इंसान मान ले |
मौसम मिलेगा एक यहाँ, बस बहार का ||
शायद ही, तेरे ख्वाब की, ताबीर हो 'शशि' |
तू इंतज़ार कर, सिर्फ, दीदार-ए-यार का ||   

Friday, April 1, 2011

वलवले

न जाने ज़िन्दगी में क्यूँ , खला मालूम होता है |
जो हमदर्दी जता दे, वो भला मालूम होता है ||
खता, पहले जो कम होती थी, बारम्बार होती है |
जिसे काफ़िर समझते हैं, वही मासूम होता है ||
अक्ल का इन दिनों, यह हाल है,जिस लफ्ज़ के मायने |
हम उनसे पूछते हैं, खुद ही वो मफ़हूम होता है ||     मायने 
फक्त ज़ालिम नहीं ज़ालिम,है शातिर भी, सयाना भी |
बजाहिर जब उसे देखो, बना मज़लूम होता है ||
'शशि' को जब भी देखा है, तन-ए- तन्हा ही देखा है |
वो कहता है की, उसके साथ इक, हज्ज़ुम होता है ||



Friday, March 25, 2011

वलवले

गमें दौराँ से घबराता नहीं हूँ |
कभी कोई कमी पाता नहीं हूँ ||
मेरा ईमान ही इंसानियत है |
किसी के दर पे मैं जाता नहीं हूँ ||
यह माना तंग-दस्ती है मुक्कदर |
मैं दामन फिर भी फैलाता नहीं हूँ ||
मैं इतराता हूँ अक्सर आईने में |
किये अपने पे पछताता नहीं हूँ ||
'शशि' को परखने वालो समझ लो |
कोई भी बात दोहराता नहीं हूँ || 

Thursday, March 24, 2011

वलवले

सबने किया शारीर को, प्यार, दुलार, श्रृंगार |
उसमे, बस्ती आत्मा , की न सुनी पुकार ||

आना-जाना साँस का, जीवन का सन्देश |
यह तन, सुन्दर आत्मा, का अस्ली परिवेश ||  

चमचा

जब से चमचा चलन में आया है |
 कुछ नयापन, वतन में आया है ||
बे-हयाई व बेईमानी को, होश्यारी में जब मिलाया है |
तब कहीं जा के आज का इन्सां, खुद को चमचा कहाने पाया है ||
खूब नुस्खा, यह हाथ आया है, हमने चमचों से दिल लगाया है |
रंग लाई है, उल्फत-ए-चमचा ,हम पे अब,बरकतों का साया है ||
जिसकी ख़्वाबों में न तवक्को थी, होश में, हाथ सब वो आया है |
मात दी है, चिराग के जिन को,दाँव,चमचे ने वो लगाया है ||
आँख वालों को, अक्ल का अँधा, आज चमचों ने ही बनाया है |
मूर्खों की इजाद है चमचा, आज-कल जिसपे, हुस्न आया है||
जब से मशहूर हो गया चमचा, हर कोई उसका चाचा. ताया है |
देख कर रह गया 'शशि' हैराँ,चमचा क्या खूब, चमचमाया  है || 
     

चमचा

जब से चमचा चलन में आया है |
 कुछ नयापन सा वतन में आया है ||
बे-हयाई व बेईमानी को, होश्यारी में जब मिलाया है |
तब कहीं जा के आज का इन्सां, खुद को चमचा कहाने पाया है ||
खूब नुसखा यह हाथ आया है, हमने चमचों से दिल लगाया है |
रंग लाई है, उल्फत-ए-चमचा ,हम पे अब,बरकतों का साया है ||
जिसकी ख़्वाबों में न तवक्को थी, होश में, हाथ सब वो आया है |
मात दी है, चिराग के जिन को,डोमव चमचे ने वो लगाया है ||
आँख वालों को, अक्ल का अँधा, आज चमचों ने ही बनाया है |
मूर्खों की इजाद है चमचा, आज-कल जिसपे, हसन आया है||
जब से मशहूर हो गया चमचा, हर कोई उसका चाचा. ताया है |
देख कर रह गया 'शशि' हैराँ,चमचा क्या खूब, चमचमाया  है ||