Monday, March 21, 2011

वलवले

नारी तुम कैसे अबला हो | तुम ही तो जग में सबला हो ||
नयन तेरे जो जल बरसाए | वो पिघले जो न पिघला हो ||
तेरे नाटक बड़े निराले |छलियों को भी जिसने छाला हो ||
धीमी सुर और तीखे बोल |जग में सुन्दर एक बला हो ||
नारी तेरा मन वो मन है | द्वेष का जिसमे दीप जला हो ||
न ममता न त्याग की मूरत | आस्तीन में सांप पला हो ||
शक्ति का ही रूप है नारी |'शशि' गर उसका मन उजला हो ||

वलवले

आईने में बस रहे, भगवान हैं |
देखने वाली, नज़र नादान है ||

यूँ करैं महसूस , मौसम का असर |
जैसे बचपन से, बुढापे का सफ़र ||
वक़्त देता है बदल, दोनों को पर |
कब बदलते हैं, नहीं चलती खबर || 

Saturday, March 19, 2011

फाल्गुन की पुरवाई बोली | आई होली आयी होली ||
रूठे हुओं को रंग लगा कर| फिर से बन जाओ हमजोली ||
खुशियाँ बिखरीं जब अपनों ने |रंगों की पिचकारी खोली ||
रंगों की रंगोली बोली |आई होली, आई होली || 

Friday, March 18, 2011

वलवले

जीने का लालच आ गया, फिर से दिमाग में |
पंचम कोई लगा गया, विरहा  के राग में ||
कट रही थी ज़िन्दगी,  बनके सजा, खता बिना |
इसको हसीं  बना दिया, सावन ने, फाग ने ||   

Thursday, March 17, 2011

वलवले

बाद मुद्दत के,अचानक जब मिले !
लाझ चाहा, लब न थे लेकिन हिले !!
दो दिलों की, गुफ्तगू  होने लगी !
आँखों- आँखों ने, किये शिकवे-गिले !! 
देखने वाला, था इक, मंजर बना !
दरम्याँ थे, दो दश्क के फासले !!
किस कदर गुजरी, नहीं पूछा गया ! 
क्या हुआ, यादों के जो थे काफिले !!
साफ उनसे क्यूँ नहीं कहते 'शशि' !
थे जहाँ बिछड़े, वहीँ पर है मिले !!    
क्यूँ जलाते हो दिल, ज़माने का !
ऐब अच्छा नहीं, सताने का !!
मुझसे मिलना, कहीं न पड़ जाये ! 
पता लिख लो, गरीब खाने का !!

Tuesday, March 15, 2011

वलवले

जिसके हक़ में मैं सदा, रब्ब से दुआ करता रहा !
वो हमेशा, मुझ पे जाने क्यूँ , शुब्हा करता रहा !!
खेल है तकदीर का, यह अब समझ आया मुझे !
दोस्ती के नाम पर ही, वो दगा  करता  रहा !!
हम-कदम चलते हुए भी, हम-नफस न बन सका !
 मैं भला करता रहा, वो बुरा करता रहा !! 
 जिसकी खुशियों के लिए, मैं मन्नते माना किया !
वो मेरे दिल को हमेशा ही, धुआँ करता रहा !!
मैं इशारों से उसे, हर बात कह देता भी था ! 
वो न जाने क्यूँ 'शशि' को, अनसुना करता रहा !!